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मैं भी जीना चाहती हूँ।

अजीब दास्तान है मेरी ,   दुनिया को सुनाना चाहती हूँ ! में एक लड़की हूँ , माँ की लाडली , पापा की जान , दोस्तों की शान , परिवार का अभिमान हूँ,  ये बार बार दोहराना चाहती हूँ।  बस एक ही चाह है दिल मैं , मैं भी जीना चाहती हूँ।  बचपन से गिर रहे आंसू को, अब  सिमटना चाहती हूँ।  जबसे पैदा हुई तबसे रो रही हूँ।  अब में भी मुस्कुराना चाहती हूँ।  दर्द भरी उन यादों को पीछे छोड़ कर , मैं भी जीना चाहती हूँ।  सारी दुनिया का बोज है मुज पर , लड़की हूँ ना !! रस्मे, रिवाज़, कायदे, कानून, इन सब बेड़िओं की कैद से, अब आज़ाद होना चाहती हूँ।  जो संभल के रखे थे राज़ दिलमें , वो सारी बातें अब बताना चाहती हूँ।  नए ख्वाब, नए उमंग,  नई राहे खोज कर , एक आज़ाद परिंदे की तरह, मैं भी जीना चाहती हूँ।  इन फूलों की तरह , अपनी ही मस्ती में खिलखिलाना चाहती हूँ।  इन भंवरो की तरह, अपनी ही धुन में गुनगुनाना चाहती हूँ।  दुनिया को भूलकर, नए रंग चढ़ा कर , मैं भी जीना चाहती ...